उत्तराखंड में कैंपा फंड पर सवाल, सरकारी सुस्ती बनी वन संरक्षण में बाधा
देहरादून। उत्तराखंड में वन संरक्षण, वन्यजीव सुरक्षा और पर्यावरणीय संतुलन के लिए बेहद अहम माने जाने वाले कैंपा फंड (CAMPA) को लेकर एक बार फिर सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली सवालों के घेरे में है।
नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की रिपोर्ट में पहले ही वित्तीय अनियमितताओं को लेकर चर्चा में रह चुका यह फंड, अब बजट खर्च में भारी सुस्ती का गवाह बनता नजर आ रहा है।
वित्तीय वर्ष 2025–26 के नौ महीने बीत जाने के बावजूद वन विभाग कैंपा फंड का 40 प्रतिशत भी खर्च नहीं कर पाया है, जबकि अब पूरे वित्तीय वर्ष के खत्म होने में महज तीन महीने का समय बचा है।
उत्तराखंड का लगभग 70 प्रतिशत भूभाग वन क्षेत्र से आच्छादित है, ऐसे में राज्य के लिए वन विभाग की भूमिका केवल प्रशासनिक नहीं, बल्कि जीवनदायिनी मानी जाती है।
वृक्षारोपण, जंगलों का संरक्षण, मानव–वन्यजीव संघर्ष को कम करना, वन क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे का विकास और ईको-टूरिज्म को बढ़ावा देने जैसे कार्यों के लिए हर साल केंद्र सरकार की ओर से राज्य को भारी-भरकम बजट दिया जाता है।
कैंपा फंड इसी उद्देश्य से बनाया गया था कि जंगलों से जुड़े जरूरी कार्य धन के अभाव में न रुकें, लेकिन जमीनी हकीकत इससे उलट नजर आ रही है।
253 करोड़ के बजट में से केवल 93 करोड़ खर्च
आंकड़े बताते हैं कि वित्तीय वर्ष 2025–26 में उत्तराखंड को कैंपा के तहत कुल 25,336.69 लाख रुपये यानी करीब 253 करोड़ रुपये जारी किए गए। इसके मुकाबले अब तक केवल 9,321.43 लाख रुपये, यानी लगभग 93 करोड़ रुपये ही खर्च हो पाए हैं।
इस तरह विभाग सिर्फ 36.79 प्रतिशत बजट ही उपयोग कर सका है। यह स्थिति तब है, जब साल के नौ महीने बीत चुके हैं और बचे हुए तीन महीनों में विभाग को 60 प्रतिशत से अधिक बजट खर्च करना होगा, जो मौजूदा हालात में बेहद मुश्किल नजर आ रहा है।
क्षेत्रवार प्रदर्शन भी निराशाजनक
कैंपा फंड के क्षेत्रवार आंकड़े भी वन विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। गढ़वाल क्षेत्र को मिले 135 करोड़ रुपये में से केवल 53 करोड़ रुपये ही खर्च हो सके, यानी 39.13 प्रतिशत।
वहीं कुमाऊं क्षेत्र में 74 करोड़ रुपये जारी हुए, लेकिन खर्च सिर्फ 25 करोड़ रुपये ही हुए, जिससे बजट उपयोग का प्रतिशत 34.24 तक सीमित रह गया। वन्यजीव क्षेत्रों के लिए जारी 31 करोड़ रुपये में से केवल 12 करोड़ रुपये खर्च किए गए, जो करीब 41 प्रतिशत है।
रिसर्च मद में हालात और भी चिंताजनक हैं। यहां 3 करोड़ रुपये के बजट में से केवल 70 लाख रुपये ही खर्च हो सके, यानी महज 22 प्रतिशत। अन्य प्रशासनिक इकाइयों को मिले लगभग 9 करोड़ रुपये में से सिर्फ 1.24 करोड़ रुपये खर्च हुए, जो केवल 14 प्रतिशत उपयोग को दर्शाता है।
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व सबसे कमजोर कड़ी
वन्यजीव जोन में कैंपा फंड खर्च के मामले में कॉर्बेट टाइगर रिजर्व सबसे फिसड्डी साबित हुआ है। यहां कुल 7.13 करोड़ रुपये जारी किए गए थे, लेकिन खर्च हो सके सिर्फ 1.30 करोड़ रुपये, यानी मात्र 18.32 प्रतिशत।
इसके मुकाबले राजाजी टाइगर रिजर्व की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही, जहां 58.29 प्रतिशत बजट खर्च किया जा सका। सर्कल स्तर पर देखें तो गढ़वाल का यमुना सर्कल और कुमाऊं का नॉर्थ कुमाऊं सर्कल भी कमजोर प्रदर्शन करने वालों में शामिल हैं।
मंत्री की समीक्षा, लेकिन सख्ती नदारद
कैंपा फंड के इस कमजोर प्रदर्शन का खुलासा उस वक्त हुआ, जब वन मंत्री सुबोध उनियाल ने विभागीय बजट खर्च की समीक्षा की। समीक्षा बैठक के बाद अधिकारियों को बजट खर्च में तेजी लाने के निर्देश जरूर दिए गए, लेकिन विभागीय सुस्ती को लेकर कोई सख्त रुख अपनाने के बजाय मंत्री ने अधिकारियों का बचाव किया और कहा आने वाले समय में बजट खर्च की रफ्तार बढ़ेगी।
तीन महीने में बजट कैसे होगा खर्च, जवाब नहीं
वन विभाग के मुखिया और प्रमुख वन संरक्षक (HOFF) रंजन कुमार मिश्रा का कहना है कि विभाग बजट खर्च को लेकर गंभीर है और बचे हुए तीन महीनों में बजट खर्च कर लिया जाएगा।
हालांकि, जब उनसे यह सवाल किया गया कि जो बजट नौ महीनों में खर्च नहीं हो सका, वह तीन महीनों में कैसे पूरा होगा, तो इसका कोई ठोस और तार्किक जवाब सामने नहीं आया। विभाग की ओर से बार-बार सिस्टम की जटिलताओं और प्रक्रियाओं का हवाला देकर जिम्मेदारी टालने की कोशिश की जा रही है।
पहले भी लैप्स हो चुका है कैंपा फंड
यह पहली बार नहीं है जब उत्तराखंड का वन विभाग कैंपा फंड का पूरा उपयोग करने में नाकाम रहा हो। पिछले वित्तीय वर्ष 2024–25 में भी केंद्र से मिले करीब 400 करोड़ रुपये में से 25 से 30 करोड़ रुपये खर्च नहीं हो पाए थे।
ब्याज को जोड़ दिया जाए तो यह रकम और भी अधिक थी। मौजूदा वित्तीय वर्ष में स्थिति और ज्यादा खराब नजर आ रही है और 100 प्रतिशत बजट खर्च होना मुश्किल दिख रहा है।
बजट लैप्स होने का खतरा, भविष्य की चिंतायदि
वित्तीयवर्ष के अंत तक कैंपा फंड खर्च नहीं हो पाया, तो यह राशि लैप्स हो जाएगी। इसका सीधा असर आने वाले वर्षों में मिलने वाले बजट पर पड़ेगा। केंद्र सरकार अगले वित्तीय वर्ष के लिए बजट आवंटन करते समय पिछली परफॉर्मेंस और बजट उपयोग की स्थिति को ध्यान में रखती है।
ऐसे में कैंपा फंड का सही और समयबद्ध उपयोग न होना न केवल मौजूदा योजनाओं के लिए नुकसानदेह है, बल्कि भविष्य में उत्तराखंड को मिलने वाले फंड पर भी इसका नकारात्मक असर पड़ सकता है।
कैंपा फंड उत्तराखंड जैसे वन बहुल राज्य के लिए केवल एक बजट मद नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और सतत विकास की रीढ़ है। लेकिन जिस तरह से यह फंड हर साल सरकारी सुस्ती और प्रक्रियागत देरी की भेंट चढ़ता जा रहा है, वह चिंता का विषय है।
अगर समय रहते जवाबदेही तय नहीं की गई और बजट खर्च की रफ्तार नहीं बढ़ी, तो इसका खामियाजा जंगलों, वन्यजीवों और अंततः आम जनता को भुगतना पड़ सकता है।



