बिग ब्रेकिंग: ‘रामपुर तिराहा कांड’ में 30 साल बाद भी अधूरा न्याय, हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

‘रामपुर तिराहा कांड’ में 30 साल बाद भी अधूरा न्याय, हाईकोर्ट ने फैसला रखा सुरक्षित

नैनीताल। उत्तराखंड राज्य आंदोलन के दौरान हुए बहुचर्चित रामपुर तिराहा गोलीकांड मामले में मंगलवार को नैनीताल हाईकोर्ट में सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद न्यायमूर्ति आशीष नैथानी की एकलपीठ ने मामले में फैसला सुरक्षित रख लिया है।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से पूछा था कि इस मामले में दर्ज छह मुकदमे किस अदालत में चल रहे हैं और उनकी वर्तमान स्थिति क्या है।

यूपी सरकार ने कहा- रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं

मंगलवार 10 मार्च को सुनवाई के दौरान उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह से जुड़े केस की सुनवाई कहां चल रही है और उसकी क्या स्थिति है, इसका कोई रिकॉर्ड उनके पास उपलब्ध नहीं है।

इस पर याचिकाकर्ता की ओर से कोर्ट को बताया गया कि मुकदमे दर्ज होने के बाद से अब तक इन मामलों में प्रभावी सुनवाई नहीं हो पाई है, जबकि इस घटना को करीब 30 साल बीत चुके हैं।

बताया गया कि देहरादून जिला जज ने नैनीताल हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल के एक पत्र के आधार पर इन मुकदमों को मुजफ्फरनगर कोर्ट में सुनवाई के लिए भेजा था। इसके बाद से ही इन मामलों में सुनवाई लंबित बताई जा रही है।

आंदोलनकारियों के साथ अत्याचार के गंभीर आरोप
राज्य आंदोलनकारी अधिवक्ता रमन शाह ने बताया कि रामपुर तिराहा कांड के दौरान 7 महिलाओं के साथ दुष्कर्म और 17 अन्य लोगों के साथ गंभीर प्रताड़ना की घटनाएं हुई थीं।

उन्होंने बताया कि इस मामले में मुजफ्फरनगर के तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह सहित सात अन्य आरोपियों के खिलाफ दर्ज केस सीबीआई द्वारा मुजफ्फरनगर कोर्ट में स्थानांतरित किए गए थे, लेकिन इनकी सुनवाई आज तक लंबित है।

राज्य आंदोलनकारियों की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दायर अपील के बाद यह मामला नैनीताल हाईकोर्ट में स्थानांतरित किया गया था।

क्या था रामपुर तिराहा कांड?

2 अक्टूबर 1994 को उत्तरांचल (अब उत्तराखंड) राज्य की मांग को लेकर बड़ी संख्या में आंदोलनकारी दिल्ली कूच कर रहे थे। इसी दौरान मुजफ्फरनगर के रामपुर तिराहा में पुलिस ने आंदोलनकारियों को रोक दिया।

आरोप है कि पुलिस ने आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज और फायरिंग की। इस दौरान कई आंदोलनकारियों की मौत हो गई। साथ ही महिला आंदोलनकारियों के साथ दुर्व्यवहार और दुष्कर्म के भी आरोप लगे।

यह घटना उस समय पूरे उत्तराखंड आंदोलन को झकझोर देने वाली साबित हुई थी और इसके बाद पूरे क्षेत्र में आक्रोश फैल गया था।

सीबीआई जांच के बावजूद लंबित मुकदमे

घटना के बाद अदालत के आदेश पर मामले की जांच सीबीआई को सौंपी गई थी। सीबीआई ने हत्या, गंभीर चोट पहुंचाने और फायरिंग से संबंधित धाराओं में मुकदमे दर्ज किए थे।

हालांकि, तत्कालीन डीएम अनंत कुमार सिंह के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए राज्यपाल की अनुमति न मिलने के कारण उन्हें राहत मिल गई थी।

विभिन्न कारणों से यह मामला वर्षों तक अदालतों में लंबित रहा। अब नैनीताल हाईकोर्ट ने सभी पक्षों याचिकाकर्ता, राज्य सरकार, उत्तर प्रदेश सरकार और सीबीआई की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया है।