बिग ब्रेकिंग: वायु गुणवत्ता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिए अहम निर्देश

वायु गुणवत्ता पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, दिए अहम निर्देश

नई दिल्ली। दिल्ली-राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) की बिगड़ती वायु गुणवत्ता पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को महत्वपूर्ण मौखिक टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए पेड़ लगाना और हरित क्षेत्र बढ़ाना सबसे प्रभावी और दीर्घकालिक उपायों में से एक है।

यह टिप्पणी उस आदेश के दौरान की गई, जिसमें दिल्ली के रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई की भरपाई के लिए चलाए जा रहे वनीकरण कार्यक्रम की निगरानी हेतु विशेषज्ञ समिति के गठन से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई हो रही थी।

पीठ के समक्ष क्या हुआ?

चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) की अध्यक्षता वाली पीठ के समक्ष एमिक्स क्यूरी वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्ण कुमार ने विशेषज्ञ समिति के एक सदस्य ईश्वर सिंह के स्थान पर नए सदस्य की नियुक्ति का मुद्दा उठाया।

ईश्वर सिंह को हाल ही में राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) का सदस्य नियुक्त किया गया है, जिसके चलते उनके स्थान पर नए सदस्य की आवश्यकता उत्पन्न हुई।

एमिक्स क्यूरी ने दो नाम सुझाए, जिनमें से पीठ ने सेवानिवृत्त भारतीय वन सेवा अधिकारी एम. डी. सिन्हा के नाम को स्वीकृति दी।

हरित क्षेत्र बढ़ाने पर अदालत की स्पष्ट राय

सुनवाई के दौरान एमिक्स क्यूरी ने यह भी बताया कि जस्टिस ए. एस. ओक की अध्यक्षता वाली पूर्व पीठ ने दिल्ली में हरित क्षेत्र बढ़ाने संबंधी आदेश पारित किए थे। उन्होंने अनुरोध किया कि वर्तमान विशेषज्ञ समिति उस कार्यक्रम की भी निगरानी करे।

इस पर चीफ जस्टिस ने सहमति जताते हुए कहा कि, “यह दिल्ली की वायु गुणवत्ता से जुड़ा विषय है। इसमें परस्पर संबंध है। इसका प्रभाव पड़ेगा।”

उन्होंने आगे टिप्पणी की कि, “जब हम वायु गुणवत्ता सुधारने के लिए प्रयास कर रहे हैं, तब हरित क्षेत्र बढ़ाना सबसे व्यवहारिक, प्रभावी और दीर्घकालिक समाधानों में से एक है।”

आगे की कार्यवाही

अदालत ने संबंधित विषय को सूचीबद्ध करने पर सहमति व्यक्त की, ताकि:

  • वनीकरण कार्यक्रम की प्रभावी निगरानी हो सके
    दिल्ली रिज क्षेत्र में पेड़ों की कटाई की भरपाई सुनिश्चित की जा सके
  • हरित क्षेत्र विस्तार से जुड़े प्रयासों को संस्थागत रूप से मजबूत किया जा सके

क्यों अहम है यह टिप्पणी?

दिल्ली-एनसीआर वर्षों से वायु प्रदूषण की गंभीर समस्या से जूझ रहा है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी न केवल पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि नीति-निर्माण और प्रशासनिक जवाबदेही के संदर्भ में भी एक स्पष्ट दिशा प्रदान करती है।