धामी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं का अधिकृत पैनल किया गठित
देहरादून। उत्तराखंड सरकार ने सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय न्यायाधिकरणों में अपनी कानूनी पैरवी को अधिक संगठित और प्रभावी बनाने के लिए अहम कदम उठाया है। न्याय विभाग ने राज्य की ओर से पैरवी के लिए वरिष्ठ अधिवक्ताओं का एक अधिकृत पैनल गठित किया है।
सरकार का दावा है कि इससे अदालतों में राज्य का पक्ष मजबूत होगा और अनियोजित नियुक्तियों से होने वाला अतिरिक्त खर्च भी कम किया जा सकेगा।
क्यों पड़ी जरूरत?
राज्य के कई मामले वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया और विभिन्न केंद्रीय न्यायाधिकरणों में लंबित हैं। बीते समय में महत्वपूर्ण मामलों में जरूरत के मुताबिक अलग-अलग वरिष्ठ वकीलों को नियुक्त किया जाता रहा है।
इस व्यवस्था को लेकर दो तरह की चुनौतियां सामने आती रही हैं।
- समन्वय और रणनीतिक निरंतरता की कमी
- वरिष्ठ अधिवक्ताओं की ऊंची फीस के कारण बढ़ता वित्तीय बोझ
इन परिस्थितियों को देखते हुए न्याय विभाग ने स्थायी पैनल प्रणाली लागू करने का निर्णय लिया।
राज्यपाल की स्वीकृति, आदेश जारी
जारी आदेश के अनुसार, माननीय उच्चतम न्यायालय और केंद्रीय मंचों पर राज्य सरकार की ओर से पैरवी के लिए नौ वरिष्ठ अधिवक्ताओं का पैनल तैयार किया गया है। इस पैनल को राज्यपाल की स्वीकृति प्राप्त हो चुकी है।
प्रमुख सचिव (न्याय) अमित कुमार सिरोही ने इस संबंध में औपचारिक आदेश जारी किया है।
पैनल में शामिल वरिष्ठ अधिवक्ता
पैनल में जिन वरिष्ठ अधिवक्ताओं को शामिल किया गया है।
- तुषार मेहता
- आत्माराम एनएस नाडकर्णी
- सुकुमार पट्ट जोशी
- निखिल गोयल
- जयंत भूषण
- निधेश गुप्ता
- रवि शंकर जांघयाला
- पीएम रवींद्रन
- अरिजीत प्रसाद
ये अधिवक्ता भविष्य में राज्य सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट और केंद्रीय न्यायाधिकरणों में पैरवी करते हुए नजर आएंगे।
क्या बदलेगा नई व्यवस्था से?
नई पैनल प्रणाली के तहत:
- अब अधिकृत सूची से ही वरिष्ठ अधिवक्ताओं का चयन होगा।
- चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ेगी।
- केस रणनीति में निरंतरता और स्पष्टता आएगी।
- विभागीय अधिकारियों और अधिवक्ताओं के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा।
सरकार का मानना है कि तय पैनल होने से अधिवक्ताओं को राज्य की नीतियों, पूर्व मामलों और कानूनी रुख की गहरी समझ विकसित होगी, जिससे अदालतों में पक्ष अधिक सुसंगत ढंग से रखा जा सकेगा।
खर्च पर भी नियंत्रण
वरिष्ठ अधिवक्ताओं की फीस अक्सर काफी अधिक होती है। पहले अलग-अलग मामलों में अलग-अलग नियुक्तियों से व्यय का आकलन कठिन हो जाता था।
अब पैनल प्रणाली के तहत फीस संरचना को अधिक स्पष्ट और नियंत्रित किया जा सकेगा। इससे सरकारी धन की बचत और जवाबदेही दोनों सुनिश्चित करने की कोशिश है।
प्रशासनिक सुधार की दिशा में कदम
न्याय विभाग का यह निर्णय प्रशासनिक सुधार की दिशा में महत्वपूर्ण पहल माना जा रहा है। इससे जहां एक ओर राज्य सरकार की कानूनी रणनीति मजबूत होगी, वहीं दूसरी ओर पारदर्शिता और वित्तीय अनुशासन को भी बढ़ावा मिलेगा।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि नई पैनल व्यवस्था अदालतों में राज्य सरकार की सफलता दर और लंबित मामलों के निस्तारण की गति पर कितना सकारात्मक प्रभाव डाल पाती



