बिग ब्रेकिंग: मुनस्यारी ईको टूरिज्म घोटाले में सूचना आयोग सख्त। 15 दिन में जांच रिपोर्ट देने का आदेश

मुनस्यारी ईको टूरिज्म घोटाले में सूचना आयोग सख्त। 15 दिन में जांच रिपोर्ट देने का आदेश

रिपोर्ट- राजकुमार धीमान 
देहरादून। उत्तराखंड राज्य सूचना आयोग ने पिथौरागढ़ जिले के मुनस्यारी में ईको हट्स और ईको टूरिज्म सुविधाओं के निर्माण में कथित अनियमितताओं के मामले में सख्त रुख अपनाया है।

आयोग ने वन विभाग के लोक सूचना अधिकारी (PIO) को स्पष्ट निर्देश दिए हैं कि यदि विभागीय जांच पूरी हो चुकी है तो सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगी गई समस्त जानकारी 15 दिनों के भीतर आवेदक को उपलब्ध कराई जाए। यह निर्देश पारदर्शिता और जवाबदेही को लेकर आयोग की गंभीरता को दर्शाता है।

मामला सीमांत पर्वतीय क्षेत्र मुनस्यारी से जुड़ा है, जहाँ ईको टूरिज्म परियोजना के अंतर्गत ईको हट्स और अन्य सुविधाओं के निर्माण में लगभग 1.63 करोड़ रुपये की कथित वित्तीय गड़बड़ी सामने आने का दावा किया गया था।

यह परियोजना स्थानीय पर्यटन को बढ़ावा देने और पर्यावरण-अनुकूल ढांचे विकसित करने के उद्देश्य से शुरू की गई थी, लेकिन वन विभाग की आंतरिक जांच में अनियमितताओं की बात उजागर होने के बाद मामला सुर्खियों में आया। आरोप तत्कालीन प्रभागीय वनाधिकारी (DFO) और आईएफएस अधिकारी विनय भार्गव के कार्यकाल से जुड़े बताए जा रहे हैं।

गुरुग्राम (हरियाणा) निवासी हरिंदर धींगरा ने सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत आवेदन दायर कर तत्कालीन डीएफओ आईएफएस विनय भार्गव के विरुद्ध की गई समस्त विभागीय कार्रवाई, जांच रिपोर्ट, नोटशीट, पत्राचार और संबंधित दस्तावेजों की प्रमाणित प्रतियां मांगी थीं।

आवेदक का तर्क था कि चूंकि यह परियोजना सार्वजनिक धन से संचालित थी, इसलिए उसकी पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित होना आवश्यक है।
सुनवाई के दौरान आयोग ने पाया कि मांगी गई सूचना उपलब्ध कराने में देरी हुई है।

इसके बाद Uttarakhand State Information Commission ने स्पष्ट निर्देश जारी किए कि यदि मामले की जांच पूरी हो चुकी है तो पूरी जांच रिपोर्ट और की गई कार्रवाई का विस्तृत ब्यौरा 15 दिनों के भीतर उपलब्ध कराया जाए।

यदि जांच अभी लंबित है, तो उसके पूर्ण होते ही 15 दिनों के भीतर समस्त जानकारी आवेदक को दी जाए। आयोग ने यह भी संकेत दिया कि सूचना देने में अनावश्यक विलंब स्वीकार नहीं किया जाएगा।

उल्लेखनीय है कि इस प्रकरण में प्रमुख सचिव (वन) को भी पत्र भेजकर विस्तृत जांच रिपोर्ट और दोषियों के विरुद्ध की गई कार्रवाई की जानकारी मांगी गई थी। अब आयोग के निर्देश के बाद वन विभाग पर समयबद्ध तरीके से तथ्य सार्वजनिक करने का दबाव बढ़ गया है।

यह मामला केवल एक आरटीआई आवेदन तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य में ईको टूरिज्म परियोजनाओं की निगरानी, वित्तीय अनुशासन और प्रशासनिक जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है।

मुनस्यारी जैसे संवेदनशील और पर्यावरणीय दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र में ईको टूरिज्म के नाम पर होने वाले विकास कार्यों में पारदर्शिता अत्यंत आवश्यक मानी जाती है।

यदि वित्तीय अनियमितताओं के आरोप सही पाए जाते हैं, तो यह न केवल सरकारी धन के दुरुपयोग का मामला होगा, बल्कि पर्यावरणीय परियोजनाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगाएगा।

राज्य सूचना आयोग का यह आदेश स्पष्ट संदेश देता है कि सूचना का अधिकार केवल कागजी प्रावधान नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का प्रभावी माध्यम है। सार्वजनिक धन से संचालित किसी भी परियोजना में जानकारी छिपाना या विलंब करना कानून के दायरे में नहीं आता।

अब सभी की निगाहें वन विभाग पर टिकी हैं कि वह निर्धारित समयसीमा में जांच रिपोर्ट और कार्रवाई का पूरा विवरण उपलब्ध कराता है या नहीं।

यह प्रकरण भविष्य में ईको टूरिज्म और वन विभाग की अन्य परियोजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण मिसाल बन सकता है।