आंसर-की विवाद पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एक्सपर्ट कमेटी से दोबारा जांच के निर्देश
नई दिल्ली। Supreme Court of India ने सोमवार को झारखंड सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) परीक्षा में विवादित तीन प्रश्नों की दोबारा जांच के लिए एक्सपर्ट कमेटी गठित करने का निर्देश दिया।
अदालत ने Jharkhand High Court के उस आदेश को आंशिक रूप से रद्द कर दिया, जिसमें प्रश्न संख्या 8, 74 और 96 के उत्तरों को गलत ठहराया गया था।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच Jharkhand Public Service Commission (JPSC) की याचिका पर सुनवाई कर रही थी।
क्या है विवाद,
मामला सिविल जज (जूनियर डिवीज़न) भर्ती परीक्षा की सीरीज़ ‘A’ के तीन प्रश्नों से जुड़ा है:
- प्रश्न 8: सही अंग्रेज़ी वाक्य चुनने से संबंधित
- प्रश्न 74: Ashwini Kumar Upadhyay v. Union of India के सुप्रीम कोर्ट फैसले में उल्लिखित IPC धाराओं पर आधारित
- प्रश्न 96: भारतीय अनुबंध अधिनियम के तहत एजेंसी कानून से संबंधित
याचिकाकर्ताओं का आरोप था कि JPSC ने या तो गलत उत्तर दिए या संशोधित आंसर-की में मनमाने बदलाव किए।
सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी,
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि भले ही हाईकोर्ट के जजों के पास व्यापक कानूनी अनुभव हो, लेकिन वे “सुपर-एग्ज़ामिनर” या विषय विशेषज्ञ की भूमिका नहीं निभा सकते।
अदालत ने स्पष्ट किया कि आंसर-की के पुनर्मूल्यांकन जैसे मामलों में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की सीमा है और ऐसी तकनीकी जांच डोमेन एक्सपर्ट्स पर छोड़नी चाहिए।
कोर्ट ने निर्देश दिया कि,
- झारखंड हाईकोर्ट प्रशासनिक पक्ष से एक नई विशेषज्ञ समिति गठित करे।
- समिति में प्रतिष्ठित लॉ प्रोफेसर और एक अंग्रेज़ी विषय के प्रोफेसर को शामिल किया जाए।
- समिति दो सप्ताह के भीतर अपनी राय JPSC को सौंपे।
हाईकोर्ट ने पहले क्या कहा था,
झारखंड हाईकोर्ट ने तीनों प्रश्नों पर विस्तृत विचार के बाद पाया था कि,
- प्रश्न 8: JPSC द्वारा संशोधित उत्तर गलत था।
- प्रश्न 74: सुप्रीम कोर्ट के आदेश में IPC की धारा 505 का उल्लेख था, न कि 506 का; JPSC का उत्तर त्रुटिपूर्ण था।
- प्रश्न 96: एजेंसी कानून से जुड़े विकल्पों में JPSC का चयन गलत था; दो विकल्प सही माने गए।
हाईकोर्ट ने JPSC को निर्देश दिया था कि प्रश्न 8 में विकल्प (A) को सही मानकर अंक दिए जाएं और प्रश्न 74 व 96 को मूल्यांकन से हटाया जाए।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि आंसर-की पहले से प्रशासनिक स्तर पर जांची जा चुकी है, तो हाईकोर्ट को न्यायिक अधिकार का उपयोग करते हुए सीधे उत्तर तय नहीं करना चाहिए था।
इसके बजाय, मामला विशेषज्ञ समिति को भेजा जाना चाहिए था। अब तीनों प्रश्न विशेषज्ञ समिति को भेजे जाएंगे और उनकी रिपोर्ट के आधार पर आगे की कार्रवाई होगी।
यह फैसला प्रतियोगी परीक्षाओं में न्यायिक दखल की सीमा तय करने और आंसर-की विवादों में विशेषज्ञों की भूमिका को स्पष्ट करने के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा रहा है।



