बागेश्वर के दूरस्थ गांव में 72 वर्षीय बुजुर्ग को डोली में उठाकर सड़क तक पहुंचाया
बागेश्वर। सरकार भले ही सड़क, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं को हर गांव तक पहुंचाने के दावे करती हो, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट है। बागेश्वर जिले के कई दूरस्थ गांव आज भी इन मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, जहां ग्रामीणों को रोजमर्रा की जिंदगी में गंभीर परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
चुनाव के समय जनप्रतिनिधि ग्रामीणों से बड़े-बड़े वादे करते हैं, लेकिन जीत के बाद गांवों की सुध लेने कोई नहीं पहुंचता। नतीजतन, वर्षों से गांवों की समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं।
इसकी ताजा मिसाल बागेश्वर जिले का हिरमोली गांव है, जहां आज भी सड़क सुविधा उपलब्ध नहीं है। गांव में रहने वाले 72 वर्षीय सेवानिवृत्त कैप्टन आनंद बल्लभ जोशी को अचानक तबीयत बिगड़ने पर डोली के सहारे मुख्य मार्ग तक पहुंचाना पड़ा।
गांव में वर्तमान में लगभग एक दर्जन परिवार निवास करते हैं, लेकिन आजादी के इतने दशकों बाद भी यहां सड़क न होना व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है।
ग्रामीणों के अनुसार, सेवानिवृत्त कैप्टन आनंद बल्लभ जोशी हाल ही में हल्द्वानी से गांव लौटे थे। अचानक तेज बुखार आने के बाद रात में उनकी तबीयत ज्यादा बिगड़ गई, लेकिन सड़क और मोबाइल नेटवर्क न होने के कारण परिजन चाहकर भी उन्हें अस्पताल नहीं ले जा सके। गांव में नेटवर्क न होने से आपातकालीन सेवा 108 से भी संपर्क नहीं हो पाया।
सुबह होते ही गांव के ग्रामीण पूरन चंद्र जोशी, बसंत वल्लभ, प्रकाश चंद, हीरा सिंह, ललित सिंह और लाल सिंह ने सामूहिक प्रयास कर डोली के सहारे साढ़े तीन किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई-ढलान और खतरनाक गदेरे पार करते हुए बुजुर्ग को सड़क तक पहुंचाया। इसके बाद निजी वाहन से उन्हें बागेश्वर जिला अस्पताल ले जाया गया।
इस मामले में ग्रामीण हरगोविंद जोशी ने बताया कि कौलाग, गाजली और तुपेड़ मोटरमार्ग की मांग वर्षों से की जा रही है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस सरकार के समय सड़क स्वीकृति की बात हुई थी, लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद यह योजना फाइलों में दबकर रह गई। ग्रामीणों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र सड़क निर्माण कार्य शुरू नहीं हुआ तो वे उग्र आंदोलन के लिए मजबूर होंगे।
वहीं, इस संबंध में लोनिवि कपकोट, बागेश्वर के अधिशासी अभियंता अमित कुमार पटेल ने बताया कि करूली बैंड से गांजली तक प्रस्तावित सड़क के 10 किलोमीटर में से 5 किलोमीटर का निर्माण कार्य पूरा हो चुका है।
शेष 5 किलोमीटर के लिए शासन को प्रस्ताव भेजा गया है। स्वीकृति मिलते ही प्राथमिकता के आधार पर निर्माण कार्य शुरू कर दिया जाएगा।
फिलहाल, सवाल यही है कि आखिर कब तक पहाड़ के लोग सड़क, स्वास्थ्य और संचार जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए जान जोखिम में डालते रहेंगे।



