अनरजिस्टर्ड वक्फ संपत्तियों पर वक्फ ट्रिब्यूनल का अधिकार नहीं: सुप्रीम कोर्ट
नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (28 जनवरी) को एक अहम फैसले में स्पष्ट किया कि वक्फ ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र केवल उन्हीं संपत्तियों तक सीमित है जो “औकाफ की सूची” में अधिसूचित हों या वक्फ अधिनियम, 1995 के तहत पंजीकृत हों।
अनरजिस्टर्ड या सूचीबद्ध न की गई संपत्तियों से जुड़े विवादों पर ट्रिब्यूनल कोई आदेश पारित नहीं कर सकता।
जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इस मामले में तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द कर दिया, जिसमें अनरजिस्टर्ड संपत्ति के संबंध में वक्फ ट्रिब्यूनल द्वारा दिए गए निषेधाज्ञा (इंजंक्शन) को सही ठहराया गया था।
कोर्ट की अहम टिप्पणी
विवादित फैसले से असहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि, “प्लेन्ट को मात्र पढ़ने से स्पष्ट है कि संबंधित संपत्ति न तो वक्फ अधिनियम के चैप्टर II के तहत प्रकाशित ‘औकाफ की सूची’ में शामिल है और न ही चैप्टर V के तहत पंजीकृत है। ऐसे में यह तय करना कि संपत्ति वक्फ संपत्ति है या नहीं, वक्फ ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।”
कोर्ट ने आगे कहा कि धारा 6(1) और धारा 7(1) के तहत ट्रिब्यूनल के समक्ष जाने के लिए संपत्ति का औकाफ की सूची में शामिल होना एक अनिवार्य शर्त है।
दो परस्पर विरोधी मिसालों का समाधान
जस्टिस के. विनोद चंद्रन द्वारा लिखे गए फैसले में वक्फ अधिनियम से जुड़ी दो परस्पर विरोधी न्यायिक धाराओं के बीच लंबे समय से चले आ रहे टकराव को सुलझाने का प्रयास किया गया।
एक ओर, अनीस फातिमा बेगम बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2010) और राशिद वली बेग बनाम फरीद पिंडारी (2022) जैसे मामलों में यह माना गया था कि धारा 83(1) ट्रिब्यूनल को वक्फ या वक्फ संपत्ति से जुड़े किसी भी विवाद पर व्यापक अधिकार देती है, चाहे संपत्ति सूचीबद्ध हो या नहीं।
वहीं दूसरी ओर, रमेश गोविंदराम बनाम सुगरा हुमायूं मिर्जा वक्फ (2010) 8 SCC 726 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ट्रिब्यूनल का अधिकार क्षेत्र सीमित और विशिष्ट है तथा केवल उन्हीं मामलों तक है जिनका स्पष्ट उल्लेख अधिनियम में किया गया है। धारा 83 केवल ट्रिब्यूनल के गठन का प्रावधान है, न कि असीमित अधिकार क्षेत्र का स्रोत।
रमेश गोविंदराम फैसला फिर से बना गवर्निंग लॉ
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि राशिद वली बेग मामले में धारा 83(1) की व्याख्या करते समय “इस अधिनियम के तहत” शब्दों को नज़रअंदाज़ किया गया, जबकि किसी संपत्ति का वक्फ होना तभी माना जा सकता है जब वह औकाफ की सूची में शामिल हो या विधिवत पंजीकृत हो।
कोर्ट ने कहा कि, “वक्फ या वक्फ संपत्ति का अधिनियम के तहत एक वैधानिक स्टेटस होना आवश्यक है, जो केवल औकाफ की सूची में शामिल होने या अधिनियम के तहत पंजीकरण से ही संभव है।”
इसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने रमेश गोविंदराम फैसले में स्थापित सिद्धांत को पुनः गवर्निंग लॉ के रूप में बहाल किया, और वक्फ अधिनियम की धारा 85 के तहत सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र को समाप्त करने के सिद्धांत की भी पुष्टि की।



