बिग ब्रेकिंग: प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर हाईकोर्ट सख्त, कर्मचारी को सेवा में बहाली का आदेश

प्रक्रियात्मक त्रुटियों पर हाईकोर्ट सख्त, कर्मचारी को सेवा में बहाली का आदेश

नैनीताल। उत्तराखंड हाईकोर्ट ने अनुशासनिक कार्रवाई में गंभीर प्रक्रियात्मक अनियमितताओं को देखते हुए एक संग्रह अमीन की बर्खास्तगी के आदेश को रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की एकलपीठ ने पूरन सिंह बिष्ट की याचिका पर सुनवाई करते हुए स्पष्ट कहा कि किसी भी सरकारी कर्मचारी के विरुद्ध की जाने वाली विभागीय जांच निष्पक्ष, पारदर्शी और नियमों के अनुरूप होनी चाहिए, अन्यथा वह कानूनी रूप से टिकाऊ नहीं मानी जा सकती।

मामला अल्मोड़ा जिले की भनोली तहसील से जुड़ा है। याचिकाकर्ता की नियुक्ति वर्ष 1989 में सीजनल संग्रह अमीन के रूप में हुई थी। लंबे कानूनी संघर्ष के बाद वर्ष 2008 में उन्हें नियमित कर्मचारी के समान लाभ प्रदान किए गए।

इसके बाद वर्ष 2009 में विभाग ने उनके विरुद्ध अनुशासनिक कार्रवाई शुरू करते हुए 20 आरोपों के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया। इस आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने पाया कि पूरे मामले में उत्तराखंड सरकारी सेवक (अनुशासन एवं अपील) नियमावली, 2003 का स्पष्ट उल्लंघन किया गया। कोर्ट के अनुसार, जांच अधिकारी ने न केवल आरोप पत्र जारी किया, बल्कि जांच रिपोर्ट में स्वयं ही दंड की सिफारिश भी कर दी, जो नियमों के विरुद्ध है।

न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय ने स्पष्ट किया कि जांच अधिकारी का दायित्व केवल आरोपों की सत्यता की जांच तक सीमित होता है। उसे सजा का सुझाव देने का कोई अधिकार नहीं है।

कोर्ट ने ललिता वर्मा बनाम उत्तर प्रदेश राज्य सहित सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि नियम 8 के तहत जांच अधिकारी को दंड के संबंध में किसी भी प्रकार की सिफारिश करने से स्पष्ट रूप से रोका गया है।

बर्खास्तगी आदेश निरस्त, बहाली का निर्देश

हाईकोर्ट ने वर्ष 2009 और 2018 में पारित बर्खास्तगी के आदेशों को पूरी तरह निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को सेवा में निरंतरता के साथ बहाल करने के निर्देश दिए हैं। साथ ही, उन्हें पूर्व वेतन एवं अन्य मौद्रिक लाभों का 50 प्रतिशत भुगतान करने का आदेश दिया गया है।

कोर्ट ने याचिकाकर्ता की स्थिति को वर्ष 2008 के उस आदेश के अनुरूप बहाल करने को कहा है, जिसके तहत उन्हें नियमित कर्मचारी के लाभ मिले थे।

हालांकि, कोर्ट ने सक्षम प्राधिकारी को यह छूट भी दी है कि वे चाहें तो मामले में नए सिरे से निर्णय ले सकते हैं। साथ ही यह सुझाव दिया कि चूंकि कर्मचारी सेवानिवृत्ति के निकट है, इसलिए यदि संभव हो तो निष्कासन के बजाय किसी कम गंभीर दंड पर विचार किया जाए।

यदि विभाग आगे जांच जारी रखना चाहता है, तो उसे वर्ष 2010 में संशोधित नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।