सरकारी जंगल पर सालों से कब्जा! सुप्रीम कोर्ट ने कहा- यह सिस्टम की चौंकाने वाली नाकामी
दिल्ली। उत्तराखंड में जंगल और सरकारी जमीन पर बड़े पैमाने पर कथित अवैध कब्जे के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को कड़ी फटकार लगाई है।
सोमवार को हुई सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने कहा कि जंगल की जमीन पर सिस्टमैटिक तरीके से कब्जा किया गया है और राज्य सरकार ने इसके खिलाफ केवल दिखावटी कार्रवाई की है। कोर्ट ने इसे सरकारी मशीनरी की “चौंकाने वाली नाकामी” बताया।
मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने जांच समिति की अंतरिम रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा कि वर्षों तक अतिक्रमण होता रहा, लेकिन जिम्मेदार अधिकारी आंख मूंदे बैठे रहे।
दो हफ्ते में विस्तृत हलफनामा दाखिल करे सरकार
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड सरकार को निर्देश दिया है कि वह दो सप्ताह के भीतर एक विस्तृत हलफनामा दाखिल करे,
जिसमें साइट प्लान, किए गए निर्माण, निर्माण की प्रकृति, कुल भूमि और उस पर कब्जा करने वालों की संख्या
का पूरा ब्यौरा दिया जाए। कोर्ट ने कहा कि अंतरिम निर्देश जारी रहेंगे।
“यह मिलीभगत और साजिश का मामला लगता है”
सीजेआई ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह मामला जमीन हड़पने वालों के साथ मिलीभगत और साजिश जैसा प्रतीत होता है। उन्होंने कहा कि राज्य के एग्जीक्यूटिव पदों पर बैठे हर व्यक्ति की इस लगातार लापरवाही में भूमिका बनती है।
कोर्ट ने सवाल किया कि 2000 में राज्य बनने के बाद आखिर 23 साल तक सरकार ने क्या किया।
“आप लोगों को पीढ़ियों तक वहां रहने और घर बनाने देते हैं और फिर अचानक कोर्ट के आदेश के पीछे छिपना चाहते हैं।”
2023 में नोटिस, फिर हाईकोर्ट से स्टे
राज्य सरकार के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि 2023 में बेदखली नोटिस जारी किए गए थे, जिसके बाद करीब 750 लोग हाईकोर्ट चले गए और स्टे लग गया। इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि क्या सरकार को 23 साल बाद यह पता चला कि उसकी जमीन पर कब्जा हो गया है।
क्या है पूरा मामला
सुप्रीम कोर्ट अनीता कंडवाल की याचिका पर उत्तराखंड में जंगल की जमीन पर कथित अवैध कब्जे के मामले की सुनवाई कर रहा है।
कोर्ट के अनुसार, 2866 एकड़ जंगल भूमि को सरकारी जंगल के रूप में अधिसूचित किया गया था, जिसका एक हिस्सा ऋषिकेश की पशुलोक सेवा समिति को लीज पर दिया गया था।
कोर्ट ने पाया कि बाद में समिति लिक्विडेशन में चली गई और 1984 में 594 एकड़ जमीन वन विभाग को सरेंडर कर दी गई, इसके बावजूद 2001 के बाद निजी लोगों द्वारा जमीन पर कब्जा कर लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तराखंड के मुख्य सचिव और प्रधान मुख्य वन संरक्षक को जांच समिति गठित करने, सभी तथ्यों की जांच कर रिपोर्ट सौंपने, जमीन की बिक्री और थर्ड पार्टी अधिकारों पर रोक, नए निर्माण पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने साफ कहा कि अगली सुनवाई में अनुपालन रिपोर्ट अनिवार्य होगी।



