आबकारी नीति में बड़ा उलटफेर। वैट हटाने पर वित्त विभाग ने लगाई रोक, बोतलें 50–100 रुपये महंगी
- राजस्व बढ़ाने के दावे धरे-धरे। आबकारी नीति के बदलाव से बिक्री और कमाई दोनों पर खतरा
रिपोर्ट- राजकुमार धीमान
देहरादून। वित्त वर्ष 2025–26 की नई आबकारी नीति में बड़ा उलटफेर सामने आया है। सरकार जहाँ 5060 करोड़ रुपये से अधिक राजस्व हासिल करने के दावे कर रही थी, वहीं वित्त वर्ष समाप्त होने से चार महीने पहले ही राजस्व गणित बिगड़ने लगा है।
विवाद की जड़: एक्साइज ड्यूटी को वैट से बाहर रखने का फैसला-वित्त विभाग को रास नहीं आया, जिसके चलते आबकारी विभाग को तत्काल नीति में संशोधन करना पड़ा। अब एक्साइज ड्यूटी पर भी 12% वैट लगाया गया है, जिसके कारण शराब की कीमतें प्रति बोतल 50 से 100 रुपये तक बढ़ गई हैं।
नीति में क्या था बदलाव और क्यों हुआ विवाद
नई आबकारी नीति में एक्साइज ड्यूटी को वैट से मुक्त रखा गया था। आबकारी विभाग का तर्क था कि यह कदम उत्तर प्रदेश जैसे पड़ोसी राज्यों से प्रतिस्पर्धा में टिके रहने के लिए उठाया गया था, जहाँ एक्साइज पर वैट नहीं है और दुकानों पर अधिभार भी समाप्त कर दिया गया है।
लेकिन वित्त विभाग ने इस कदम पर कड़ा ऐतराज जताया। कई दौर की बैठकों और स्पष्टीकरणों के बावजूद वित्त विभाग वैट हटाने को तैयार नहीं हुआ। नतीजतन, मजबूरन आबकारी विभाग को वैट को पुनः लागू करना पड़ा।
कीमतें बढ़ीं, बिक्री घटने का डर
बढ़ी कीमतों का सीधा असर बिक्री पर पड़ने का अनुमान है। पर्यटन-आधारित प्रदेश उत्तराखंड में शराब के संतुलित दाम बिक्री को बढ़ावा देते हैं और तस्करी पर नियंत्रण रखते हैं।
अब कीमतें बढ़ने के बाद उत्तराखंड में शराब पड़ोसी राज्यों की तुलना में अधिक महंगी हो गई है। इससे आशंका जताई जा रही है कि पर्यटक अधिकतम अनुमन्य कोटा अपने साथ राज्य के बाहर से लाकर खरीद को कम कर सकते हैं। ऐसे हालात में स्थानीय बिक्री प्रभावित होना तय माना जा रहा है।
राजस्व लक्ष्य पर डबल झटका
- आबकारी विभाग का अनुमान था कि नए वित्त वर्ष में लक्ष्य से 700 करोड़ रुपये अधिक आय हो सकती है। लेकिन अब स्थिति उलट गई है।
- वैट जोड़ने से विभाग को महज 50 करोड़ रुपये की अतिरिक्त आय होने की उम्मीद है।
- दूसरी ओर, उपभोक्ताओं पर 150 करोड़ रुपये का अतिरिक्त व्यय भार पड़ेगा।
- यदि कीमतों के कारण मांग घटी, तो राजस्व में लगभग 250 करोड़ रुपये की कमी का खतरा मंडराने लगा है।
विभाग के सामने अभी भी 25 लाख पेटियों की बिक्री का लक्ष्य अधूरा है। ऐसे में नीति बदलाव से ना सिर्फ सरकार की राजस्व उम्मीदें डगमगा गई हैं, बल्कि बाजार का संतुलन भी बिगड़ने की कगार पर पहुँच गया है।



